फर्जी मुठभेड़ो में मारे गए पचास से अधिक आदिवासी व् दलित
हत्यारे पुलिस कर्मी पदकों से नवाजे गए
विजय विनीत (सोनभद्र )
एक वर्ष पूर्व देश में जब रूचिका छेड़छाड़ मामले में हरियाणा के पूर्व डीजीपी एस.के.राठौर चर्चाओं में थे व उनके द्वारा किये गये घिनौने कुकृत्य की देश भर में भर्त्सना की जा रही थी, उसी समय उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में छः वर्ष पूर्व हुई मुठभेड़ को स्थानीय फास्ट ट्रैक कोर्ट ने फर्जी करार देते हुए उसमें शामिल 14 पुलिस कर्मियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाने का ऐतिहासिक फैसला दिया। इस फैसले से पूरे देश में एक बार फिर पुलिस की वर्दी शर्मसार व खून के छीटें से लाल हुई तो वहीं न्यायालयीय व्यवस्था के प्रति भी लोगों का विश्वास बढ़ा। इस से न्याय प्रक्रिया व जनवादी ताकतों की जीत हुई। सोनभद्र की अदालत द्वारा सुनाया गया यह फैसला सिर्फ रनटोला मुठभेड़ ही नहीं बल्कि तमाम मुठभेड़ों पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। वैसे भी उत्तर प्रदेश पुलिस मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में देश में सबसे प्रथम पायदान पर है। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में हुई यह मुठभेड़ कोई पहली घटना नहीं थी। जिस पर उंगली उठी हो। जौनपुर के वर्तमान बसपा सांसद धनंजय सिंह को भदोही पुलिस ने चार बदमाशों समेत आठ वर्ष पूर्व मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया था। इसी तरह मीरजापुर जिले के भवानीपुर में 9 मार्च 2001 को 16 लोगों को पुलिस ने मारा था और कहा था कि मारे गये सभी नक्सली थे। इसमें जिस खूंखार नक्सली देवनाथ,लालब्रत,सुरेश, को पुलिस ने ढेर दिखाया था। वह सभी जीवित निकले। उस मुठभेड़ की जॉंच सीबीआई कर रही है।सोनभद्र उत्तर प्रदेश के सर्वाधिक अशिक्षित व पिछड़े जनपदों में शुमार करता है। पिछले एक दशक से यह जिला इस प्रांत के अति नक्सल प्रभावित जिलों में भी शामिल हो गया है। देश का यह पहला जनपद है जिसकी सीमाएं चार-चार राज्यों बिहार झारखण्ड,छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश से लगती है। यह जिला उर्जा राजधानी के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि यहां देश की सर्वाधिक बिजली पैदा की जाती है। वहीं दूसरी ओर यही जिला देश का सबसे गरीब, पिछड़ा व भूमि विवादों में सबसे ऊपर है जहां की सर्वाधिक आबादी आदिवासी जाति के लोगो की है। इसी जिले में 2 सितम्बर 2003 को पिपरी थाना क्षेत्र के रनटोला के जंगल में यहॉं की अपने आप को जाबाज कहने वाली पुलिस ने दो युवकों को लुटेरा बताकर मुठभेड़ में मार गिराया। मारे गये दोनों युवक पड़ोसी प्रान्त झारखण्ड के गढ़वा जनपद के मेराल कस्बे के रहने वाले थे। इसमें एक प्रभात कुमार श्रीवास्तव उर्फ अरूण इलाहाबाद में बी.ए.प्रथम वर्ष का छात्र था। उसके पिता लल्लन प्रसाद श्रीवास्तव राजकीय माध्यमिक विद्यालय मेराल में प्रधानाचार्य थे। दूसरा युवक रमाशंकर साहू पुत्र बंशीधर साहू था। दोनों युवक एक ही गॉंव के थे। इस मुठभेड़ के बाद तमाम मानवाधिकार संगठन पीयूएचआर, भाकपा माले, राष्ट्रीय वन श्रमजीवी मंच समेत तमाम जन संगठनों ने इस फर्जी मुठभेड़ की जांच की आवाज तेज़ की। मारे गये छात्र प्रभात के पिता लल्लन श्रीवास्तव ने भी उच्च न्यायालय,मानवाधिकार आयोग समेत तमाम जगह गुहार लगाई। अन्ततः उनकी फरियाद रंग लायी और तत्कालीन जिलाधिकारी ने मजिस्ट्रेट जॉंच का आदेश ज़ारी कर दिया। मजिस्ट्रेट जांच अपर जिलाधिकारी द्वारा की गयी जिन्होंने सर्व प्रथम मुठभेड़ स्थल देखा और फिर उन तमाम पहलुओं का बारीकी से निरीक्षण किया जिसने इस मुठभेड़ को अंजाम दिया। पोस्टमार्टम की रिर्पोट पर अध्ययन करने पर उन्होंने अपनी रिर्पोट में लिखा कि शरीर पर जिस तरह से गोली के निशान बने हुये हैं वह 60 से 70 फीट से चलाई गयी गोली से नहीं बन सकते हैं, बल्कि गोली बहुत ही पास से चलाई गई। अपर जिलाधिकारी की यही रिर्पोट सी0बी0सी0आई0डी द्वारा जांच करने का आधार बनी। पुलिस ने मुठभेड़ की कहानी में दर्शाया था कि लूटेरे लूट के बाद उसी स्थान पर माल बांटने आये थे। माल बांटने के लिए वह फुसफुसाहट में बातचीत कर रहे थे। जिसे 60-70 फीट की दूरी से सुना गया। उनकी फुसफुसाहट सुनकर जब पुलिस ने उन्हें देखा और आत्म समर्पण के लिए कहा तो लूटेरो ने फायर शुरू कर दिया। आत्म रक्षार्थ पुलिस ने भी गोली चलायी। जिससे दोनों युवक मारे गये। अपर मजिस्ट्रेट ने 17 जनवरी 04 को अपनी जाँच आख्या में लिखा था कि कथित बदमाशों को पकड़ कर लाया गया था व बाद में मुठभेड़ में मारा गया था। इसी खुलासे के बाद जांच सी.बी.सी.आई.डी को सौंपी गयी जिसके तहत इस मामले में गहन जांच शुरू हो गयी। 02जॉंच के दौरान मुठभेड़ से सम्बन्धित तमाम पहलुओं पर विचार किया गया। जांच दल मारे गये दोनों युवकों के पिता व उन तमाम लोगों से मिले जहां इस घटना से सम्बन्धित बातें जुड़ी थी। जांच के बाद सीबीसीआईडी के निरीक्षक ने घटना से सम्बन्धित थाना क्षेत्र पिपरी में 21 फरवरी 2006 को 15 पन्द्रह पुलिस कर्मियों के खिलाफ मुठभेड़ को फर्जी करार देते हुए हत्या समेत विभिन्न धाराओं में प्राथमिकी दर्ज करा दी । इसमें दुद्धी कोतवाली क्षेत्र के तत्कालीन एसएसआई जयनाथ मिश्र, बभनी थानाध्यक्ष रामेश्वर नाथ, बीजपुर थानाध्यक्ष कमलेश्वर प्रताप सिंह,चौकी इंचार्ज म्योरपुर राजेश कुमार सिंह, कास्टेबिल राजेश सिंह , केश बिहारी,शाहजहां खॉं, अशोक कुमार,प्रमोद कुमार, दिनेश, सतीश कुमार, चन्द्रिका यादव, राणा प्रताप सिंह, शिवशंकर सिंह, व रविन्द्रनाथ मौर्य शामिल थे। सीबीसीआईडी द्वारा दर्ज करायी गयी प्राथमिकी में उल्लेख किया कि मारे गये युवक प्रभात कुमार, रमाशंकर व दो अन्य युवक रामप्रवेश व जय शंकर झारखण्ड से ट्रेन पकड़कर अपनी रिश्तेदारी मे जा रहे थे। झारोखास रेलवे स्टेशन पर रेल की क्रासिंग होने के कारण जब ट्रेन रूकी, इसी बीच पुलिस वहां पहुंच गयी और इन्हें पकड़ लिया। पुलिस द्वारा रामप्रवेश व जय शंकर को पुनः बस पर बैठाकर वहां से 50कि0मी दूर डाला चौकी पर लाया गया जहां से बाद में उन्हें छोड़ दिया गया। प्रभात व रमाशंकर को ट्रेन से 25 कि0मी दूर रेनुकूट लाया गया। फिर रेनुकूट से 9 कि0मी दूर रनटोला के जंगल में इस मुठभेड़ को अंजाम दिया गया। अपराध शाखा की विवेचना से भी मृतक प्रभात कुमार व रमाशंकर को झारोखास रेलवे स्टेशन से पकड़कर ले जाने की बात प्रमाणित की है जिससे पुलिस द्वारा बनायी गयी मुठभेड़ की कहानी फर्जी पायी गयी। इस मामले में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद एक-एक कर 14 पुलिस कर्मियों ने अदालत में आत्म समर्पण कर दिया। जबकि एक दरोगा जयनाथ मिश्र अदालत का फैसला आ जाने के एक साल बाद भी फरार चल रहे हैं। इस पूरे मामले में कुल 16 गवाहों का बयान हुआ। 4 जनवरी 2010 को अपर जनपद एवं सत्र न्यायाधीश फास्ट ट्रैक कोर्ट का कक्ष खचाखच भरा हुआ था। परिसर में भी मीडिया कर्मी व तमाम लोग बड़ी संख्या में मौजूद थे। सभी को इस चर्चित काण्ड के फैसले का इन्तजार था। माननीय न्यायाधीश ने जैसे ही सभी नामजद पुलिस कर्मियों पर अपराध साबित किया मृतक के पिता लल्लन प्रसाद की ऑंखों से ऑंसू निकल पड़े, वहीं अदालत में मौजूद कुछ पुलिस कर्मी फफककर रो पड़े। शायद उन्हें अपने किये का आभास हो चुका था। इस मामले में अदालत ने सभी पुलिस कर्मियों को आजीवन कारावास की सुनाई। गोली चलाने वालों पर एक-एक लाख व अन्य पर 50.-50 हजार रूपये का अर्थदण्ड भी लगाया। आजीवन कारावास के दौरान तीन साल सश्रम कारावास की सजा भी सुनाई। इस फैसले से पुलिस को महकमे को सांप सूघ् गया और विभाग मे अफरा-तफरी मच गयी। रनटोला फर्जी मुठभेड़ मामले में अपने फैसले में सत्र न्यायाधीश फास्ट ट्रैक कोर्ट ने यह साफ लिखा है ‘कि पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य से यह साबित है कि उक्त चारों व्यक्तियों को एक साथ पकड़ा गया था तथा दोनों मृतकों को फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया था। मुठभेड़ स्थल से दोनों मृतकों को आयी चोटे यह साबित कर रही है कि जिस तरह से पुलिस मुठभेड होना बता रही है वह फर्जी है। पुलिस द्वारा बतायी गयी कहानी किसी भी परिस्थिति मे विश्वास किये जाने योग्य नहीं है। दोनों मृतकों को आयी चोटे यह साबित कर रही है कि केवल 10-15 फीट की दूरी से गोली चलायी गयी थी। अतः10-15 फीट की दूरी पर उपस्थित ऐसे पुलिस पार्टी जिनके पास ए.के.47 एवं एस.एल.आर.जैसे असलहे हो उनके ऊपर दो बदमाश जिनके पास एक देशी कट्टा व 303 बोर का कट्टा हो के द्वारा हमला करने की कल्पना नहीं की जा सकती। परिस्थितियां यह साबित कर रही है कि पुलिस पार्टी द्वारा एक सुनियोजित ढंग से मृतकों की हत्या की गयी है। पुलिस अभियुक्तों द्वारा आत्म बचाव के सम्बन्ध में कोई साक्ष्य प्रस्तुत न करके अपने आत्म बचाव के तर्को को साबित नहीं किया है। जो न्यायालय को इस निष्कर्ष की ओर ले जा रही है कि वाकई में दिनांक 02-09-03 को रनटोला के जंगल में जो पुलिस मुठभेड़ बतायी जा रही है, वह मुठभेड़ फर्जी थी। निःसंदेह यह हत्या उत्तर प्रदेश की पुलिस उपनिरीक्षक एवं सिपाहियों द्वारा दो निर्दोष लोगों को पकड़कर जंगल में ले जाकर पुलिस बल से मुठभेड़ दिखाकर कारित की गयी है। यही नहीं सरकारी अभिलेखों में हेराफेरी करने के दृष्टिकोण से पुलिस की जी.डी. में भी उलट फेर किया है।’ इस मामले पर माननीय न्यायाधीश ने गंभीर टिप्पणी करते हुए लिखा कि ‘‘अभियुक्तों द्वारा कारित यह कृत्य घोर निन्दनीय एवं गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। जब रक्षक ही भक्षक हो जायेगा तो जन सामान्य की सुरक्षा व्यवस्था असंभव हो जायेगी तथा जन सामान्य का विश्वास इस एजेन्सी से उठ जायेगा।’’ सी.बी.सी.आई.डी. के लोक अभियोजक मे तो अपनी मांग में कहा था कि जिस संस्था पर जन सामान्य की रक्षा करने का दायित्व हैं उन्हीं के द्वारा दो लोगों को पकड़कर उनकी हत्या की गयी है, इस तरह से इन दोषी अभियुक्तो को मृत्यु दण्ड से कम सज़ा नहीं देनी चाहिये। अब जब मुठभेड के लगभग छः साल बाद यह फैसला आया है और दोषी पुलिस कर्मियों को सजा हो गयी है तो तत्कालीन पुलिस अधीक्षक के. सत्यनारायणा पर भी हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग ज़ोर पकड़ने लगी है। गौर तलब है कि यह घिनौना और नृंशस कार्य केवल पुलिस की ही उपज नहीं है। इस कार्य के लिये जिले के पत्रकारों के एक वर्ग ने पुरज़ोर तरीके से पुलिस का साथ दिया था। जो सच आज इस फैसले के बाद उजागर हुआ है। पुलिस अधीक्षक ने मुठभेड़ के पहले रेनुकूट के एक अतिथि गृह में कुछ पत्रकारों के साथ बैठक की थी। उन्होने पत्रकारों से मुठभेड़ में इन दोनों युवकों को मारने के लिये सहयोग की अपील की थी और कुछ पत्रकारों ने दोनों युवकों को गोली मारने की हामी भर दी। इस घटना का मैं खुद चश्मदीद गवाह हूं मैंने पत्रकारों के किये जा रहे इस कृत्य का विरोध किया लेकिन मेरी ज़बान और कलम दोनों को रोक दिया गया। पत्रकारों और पुलिस के इस बेमेल गठजोड़ ने दो परिवारों के घरों की खुशियां चन्द मिनट में ही छिन ली। वह कलम जो अन्याय का विरोध करने की क्षमता रखती थी, स्वयं खूनी बन गयी। तब मुझे लगा था कि हमारे जैसे लोगों के हाथ में रहते हुए पहली बार कलम हार गयी थी। चाहकर भी किसी बड़े अखबार ने घटना की सच्चाई उजागर नहीं की थी। फिर भी पत्रकारों के इस घिनौने कृत्य को इलाहाबाद से छपने वाले एक साप्ताहिक अखबार ‘ न्यायाधीश’ ने मेरी रिर्पोट को छापा।यह पहली बार हुआ है कि रनटोला मामले में सत्र न्यायालय द्वारा इतना अहम फैसला आ जाने के बाद मानवाधिकार संगठनों, बुद्धिजीवीयों, प्रगतिशील समुदायों द्वारा यह मांग उठाई जा रही है कि उन पत्रकारों को भी तत्कालीन पुलिस अधीक्षक के साथ सह अभियुक्त बनाया जाये जिन्होंने उस बैठक में हिस्सा लिया था जहां दो मासूमों की हत्या करने का फैसला हुआ। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक वर्तमान में सोनभद्र के पड़ोसी जिले मीरजापुर में तैनात है। मगर इस मुद्दे पर वह मीडिया से कोई बात नहीं करना चाहते। मृतक प्रभात के पिता लल्लन श्रीवास्तव इस फैसले पर खुश हैं तो लेकिन इसे वह आधी जीत बताते है। उनका कहना है कि जब तक तत्कालीन एस.पी. को सज़ा नहीं होगी तब तक वे चैन से नहीं बैंठेगे न ही उनके बेटे की आत्मा को शांति मिलेगी। इस मुठभेड़ में दोषी अधिकारियों व पत्रकारों को सज़ा मिलने से लल्लन प्रसाद के बेटे की आत्मा को तो शांति मिलेगी लेकिन इस जिले में ऐसे सैंक
(तत्कालीन एस पी के , सत्यनारायण )
ड़ों मां बाप को कब शांति मिलेगी जिनके बच्चों को भी यहां की पुलिस ने बेरहमी से मुठभेड़ दिखा मौत के घाट उतार दिया। रनटोला मुठभेड़ तो मात्र एक नमूना है सोनभद्र पुलिस के चाल, चलन व चरित्र का , इस इलाके में इस तरह की ऐसी पचासों मुठभेड़ हुई हैं, जिनमे पुलिस द्वारा दलितों व आदिवासीयों को गोलियों से भून डाला गया है। यह हत्यायें अति नक्सल प्रभावित सोनभद्र, चन्दौली व मीरजापुर जिले में तथाकथित माओवादीयों को मार गिराने के नाम पर हुई हैं। इन तीनों जिलों में आदिवासी व दलित काफी संख्या में है व एक समय में इन जंगलों पर आदिवासियों का ही राज हुआ करता था। आज वहीं आदिवासी शोषण, उत्पीड़न का शिकार है। इस इलाके में जितनी इनकी संख्या है कही उससे अधिक संख्या उनके उत्पीड़न, शोषण व अन्तहीन दुःख-दर्द की है। जब इस शोषण, उत्पीड़न व अपने हकों को लेकर दलित व आदिवासी अपनी आवाज़ बुलंद करने लगे तो उन्हें नक्सली करार कर उनके तमाम हकों को छीनने व जनवादी ताकतो को समाप्त करने का काम किया गया। पिछले एक दशक से इस समूचे आदिवासी इलाके में सत्ता पोषित कुचक्र का शिकार हजारों निरीह बने हैं। उत्तर प्रदेश में सिर्फ सरकारें बदलती रही। उनका नजरिया व कार्यप्रणाली एक जैसा रहा । प्रदेश की बागडोर भाजपा,सपा व बसपा के बीच हस्तांतरित होती रही। मुख्यमंत्री के रूप में रामराज की बात करने वाले राजनाथ सिंह दलितों की शुभचिंतक मायावती व समाजवाद के पोषक मुलायम सिंह प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते रहें। किसी भी सरकार के कार्यकाल में दलित बध का सिलसिला रूका नहीं। इस इलाके में जहां तमाम दलित युवकों को फर्जी मुठभेड़ों में मारा गया।वहीं तमाम परिवारों के लोगों पर नक्सलियों का शरणदाता होने का आरोप लगा। किसी के घरों में अगर हथियार बन्द दस्ते के लोग जबरिया घुसकर खाना खायें तो वह भी जेल गया। इन सरकारों के कार्यकाल में पुलिसिया कार्यप्रणाली में कोई बदलाव नहीं आया। जो पुलिस की मुखबीरी नहीं किया उसके परिवार की महिलाओं व लड़कियों तक को नक्सली बताकर जेल भेजा गया। शायद सोनभद्र प्रदेश का पहला जिला होगा, जहॅं जनवादी तरीके से हक-हकूक की बात करने वाली महिलाओं पर रासुका व गैंगेस्टर की कार्यवाही हुई।फर्जी मुठभेड़ों का यह सिलसिला सन् 2001 से शुरू हुआ। सोनभद्र पुलिस ने 21 जनवरी 2001 को पन्नूगंज थाना क्षेत्र के खदरा गांव से रामेश्वर नामक दलित युवक को (जो अपनी ससुराल आया था ) उठाकर धंधरौल बांध के पास गोली मार दी। इस पर भाकपा (माले) ने जहां एक पखवारे तक जिला मुख्यालय पर क्रमिक अनशन किया वहीं उस समय बहुजन समाज पार्टी ने भी इस पर खुब हो-हल्ला मचाया। अभी यह शोर-गुल थमा भी नहीं था कि सोनभद्र पुलिस ने चन्दौली के एक किसान नेता गुलाब हरिजन को चुर्क पहाड़ी पर 08 फरवरी 2001 को मुठभेड़ में मार गिराया। गुलाब के मारे जाने से सोनभद्र, चन्दौली व मीरजापुर के लोग भौचक रह गये। गुलाब इन जिलों में जनवादी किसान नेता के रूप मे जाने जाते थे। वह जिला पंचायत का चुनाव भी लड़े थे। पुलिस ने उनका सम्बन्ध माओवादी संगठन से होना बताया। इस पर भाकपा (माले) के राज्य सचिव का.अखिलेन्द्र प्रताप सिह ने पुलिस को माओवादीयों व गुलाब के सम्बन्ध उजागर करने की चुनौती दी। बसपा सरकार के वर्तमान मंत्री इन्द्रजीत सरोज राबर्ट्सगंज सदर तहसील में आयोजित इस धरने में शामिल हुये थे। वर्तमान विधायक सत्य नारायण जैसल पूर्व विधायक परमेश्वर दयाल, भदोही के पूर्व सांसद नरेन्द्र कुशवाहा, रमेश वर्मा, जिलाध्यक्ष बसपा समेत तमाम कार्यकर्ताओं ने रामेश्वर की मुठभेड़ को हत्या बताया था व इस सम्बन्ध में मुख्य मंत्री के नाम पत्र भी लिखा पूरी घटना की सीबीआई जॉंच की मांग की गयी थी। लेकिन तत्कालीन भाजपा सरकार द्वारा इन मुठभेड़ों की जांच करने की कोई भी कार्यवाही में नहीं की गई । इसके बाद तो मानो पुलिस को लाईसेंस मिल गया और सन् 2002 में मीरजापुर के भवानीपुर में इन तीनों जनपदों की पुलिस ने होलिका दहन के दिन 16 दलितों व आदिवासीयों को नक्सली बताकर उनके खून से होली खेली। जिन डेढ़ दर्जन लोगों को पुलिस ने निर्ममता से गोली मारी उसमें एक 11 वर्षीय बालक कल्लू भी था। मारे गये लोगों में पुलिस रिकार्ड मे खूंखार नक्सली के रूप में देवनाथ व लालब्रत का भी नाम शामिल था। पुलिस ने सभी शवो का आनन-फानन में मीरजापुर में परीक्षण कराया । इसलिये शव परिजनों को न सौंपकर गंगा नदी के हवाले कर दिये गये। इसके बाद पुलिस ने दस मृतकों के नामों की सूची जारी की, व शेष को अज्ञात बताया। इस सूची मे जिस सुरेश बियार को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया था। उसने घटना के एक सप्ताह बाद 14 मार्च 2002 को मीरजापुर कचहरी में भवानीपुर हत्या काण्ड के विरोध में बुलाई गयी सभा में उपस्थित होकर पुलिस को अपने जिन्दा होने का सबूत दिया। इसके बाद तो पीयूसीयूएल ,पीयूएचआर ,पीयूडीआर ,जैसे मानवाधिकार संगठनों ने इस मुठभेड़ की पर्त और पुलिस की बखिया उधेड़नी शुरू की। मानवाधिकार संगठनों के दबाव के चलते ही भवानीपुर काण्ड की मानवाधिकार आयोग द्वारा जांच की गयी लेकिन दुर्भाग्यवश अभी तक यह रिर्पोट ज़ारी नहीं की गयी है। इसी बीच मारे गये देवनाथ व लालब्रत ने भी नौगढ़ में अपने को जिन्दा होने का दावा कर दिया। आज तक पुलिस यह बताने में नाकाम है कि देवनाथ,लालब्रत, सुरेश बियार की जगह जो मारे गये वे कौन थे। इसे मानवाधिकार संगठनों ने नरसंहार करार दिया और तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराते हुए पीयूसीएल ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल की। दुर्भाग्यवश यह याचिका उच्च न्यायालय द्वारा यह कह कर स्वीकार नहीं की गयी ‘ कि इस याचिका में कुछ खास नहीं है’ । पुलिस द्वारा भवानीपुर मुठभेड़ का जश्न मनाया गया, तत्कालीन डीजीपी एम.सी.द्विवेदी ने इस मुठभेड़ को जायज़ ठहराया और कहा कि ऐसी मुठभेड़ तो होती रहेगी। वहीं वाराणसी के आईजी वी.के.सिंह ने पुलिस कर्मियों को बधाई दी जो कि स्वयं भवानीपुर में मुठभेड़ के दौरान मौजूद थे। लेकिन भवानीपुर हत्या काण्ड ने प्रदेश स्तर पर तमाम मानवाधिकार संगठनों, प्रगतिशील ताकतों व बुद्धिजीवी वर्ग को लामबंद किया व इस हत्याकाण्ड के विरोध में कई कार्यक्रम हुए। सोनभद्र के मुख्यालय राबर्ट्सगंज में इस फर्जी मुठभेड़ को लेकर पीपुल्स यूनियन फार ह्यूमन राइट्स द्वारा दो दिवसीय मानवाधिकार सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसमें पूर्व न्यायाधीश इलाहाबाद उच्च न्यायालय वी.के.मेहरोत्रा व पूर्व न्यायाधीश पंजाब राजेन्द्र सच्चर समेत पीयूसीएल के उपाध्यक्ष चितरंजन सिंह , पूर्व जिला जज भगवन्त सिंह, पूर्व शिक्षा निदेशक उत्तर प्रदेश डा. कृष्णा अवतार पाण्डेय, सम्पादक अरूण खोटे, कामरेड अखिलेन्द्र प्रताप सिंह, का0 सलीम समेत कई मानवाधिकार कार्यकर्ता शामिल हुए। माननीय न्यायाधीश श्री सच्चर ने भवानीपुर की घटना को पंजाब से जोड़ा और कहा किवर्षों पूर्व बसों से उतारकर छः निर्दोष युवकों की हत्या कर दी गयी। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सीबीआई से करायी गयी जांच में मुठभेड़ फर्जी पायी गयी। ठीक यहीं स्थिति भवानीपुर की है। उन्होंने इस घटना का सबसे दुःखद पहलू इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा इन फर्जी मुठभेड़ों पर याचिका को स्वीकार न करना बताया। लेकिन श्री सच्चर द्वारा उत्तर प्रदेश में हो रहे मानवाधिकार हनन के मामले के सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय को भेजे गये पत्र पर ही उच्चतम न्यायालय ने मानवाधिकार आयोग को भवानीपुर काण्ड की जांच करने के आदेश दिये। सीबीआई जॉंच भी लम्बित है लेकिन
(रन टोला मुठभेड़ में मारे गए दोनों युवक )
लगभग दस वर्ष बाद भी जॉंच रिपोर्ट सार्वजनिक न होना केंद्र व राज्य सरकारों की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़ा करती है। साथ ही यह भी आभास होता है कि सरकारें आज भी पूरी तरह सामन्ती व्यवस्था के तहत संचालित हैं और उन्हें दलितों व निर्दाषों के मुद्दे से कोई लेना-देना नहीं।भवानीपुर हो चाहे, सोनभद्र का करहिया अथवा चन्दौली में हुई मुठभेड़े। ऐसी हिंसा की शुरूआत क्यों हुई इसके पीछे के कारणों पर गौर किया जाये तो उत्तर प्रदेश की तत्कालीन भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह इस नरसंहार के लिये कहीं न कहीं जरूर दोषी हैं। राज्य द्वारा हिंसा का यह क्रूर खेल तब शुरू हुआ जब 13 अक्टूबर 2000 को सोनभद्र के करमा थाना क्षेत्र में रात में मुठभेड़ के दौरान चन्दौली के नौगढ़ थानाध्यक्ष ओ.पी. सिंह व सिपाही वेद प्रकाश की कथित माओवादीयों की गोली लगने से मौत हो गयी। इस पर मृत थानाध्यक्ष व सिपाही को श्रद्धांजलि देने पहुंचे मुख्यमंत्री श्री राजनाथ सिंह ने पुलिस को ललकारा और कहा कि ‘‘ अगर वे एक मारे तो आप चार मारे।’’ उनका यह बयान इस समूचे आदिवासी इलाके के लिए शोषण उत्पीड़न व दमन का कारण बन गया। उनके इस बयान के बाद सोनभद्र, चन्दौली व मीरजापुर में मुठभेड़ों की बाढ़ आ गयी। भवानीपुर की घटना में शामिल तो इन तीनों जिलों की पुलिस थी। लेकिन पदोन्नति व पुरस्कार सिर्फ मीरजापुर पुलिस को मिला। सोनभद्र व चन्दौली पुलिस ने भी मीरजापुर पुलिस की तरह पदोन्नति व पुरस्कार पाने के लालच में माओवादीयों के नाम पर दलितों व आदिवासीयों की हत्या का अभियान शुरू कर दिया। मई 2001 में करमा थाने की पुलिस ने टिकुरिया गॉंव निवासी राजेन्दर हरिजन को मार गिराया। राजेन्दर क्षेत्र में अपनी बिरादरी के स्वाभिमान, सम्मान व हक़ की आवाज़ उठाने लगा था। इसे भी पुलिस ने नक्सली की सूची में शामिल कर दिया था। इसी वर्ष जुलाई के प्रथम सप्ताह में पन्नूगंज पुलिस ने बगौरा गॉंव निवासी बचाउ हरिजन को मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया। जबकि रामगढ़ बाजार के तमाम लोगों का कहना था कि पुलिस ने उसे बाजार में खरीददारी करते वक्त पकड़ा। इसी तरह सितम्बर और नवम्बर में भी एक-एक दलित युवकों की पुलिस ने हत्या की। अप्रैल 2002 में सोनभद्र के बीजपुर थाना क्षेत्र के करहिया गॉंव में पुलिस ने ठीक भवानीपुर की तर्ज पर चार युवकों को गोली मार दी। इसमें बसंत,राजू व सुरेश नामक युवक की ही शिनाख्त हुई जो चपकी गॉंव के थे। बाद में सुरेश जिन्दा निकला। आज सुरेस अपने गावं में हैं, इस मुठभेड़ में मारे गये अन्य दो लड़के कहां के थे आज तक उनका पता नहीं चला। पुलिस ने तो अगस्त २००२में मानवता व कानून की सारी हदे तोड़ दी। पन्नूगंज थाना क्षेत्र के केतार गॉंव निवासी मदन कुशवाहा, चोपन थाना क्षेत्र के कन्हौरा गॉंव अपने ससुराल गया हुआ था। वहां से अपनी पत्नी को लेकर चोपन बाजार आया फिर बस पकडकर राबर्ट्सगंज के लिए चला।चोपन सोन नदी का पुल पार करते ही पुलिस ने उसे उसकी पत्नी के सामने बस से उतार लिया। फिर राबर्ट्सगंज कोतवाली पुलिस ने उसे भी मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया। इस मामले को तत्कालीन विधायक परमेश्वर दयाल ने विधान सभा में उठाया लेकिन दोषी पुलिसजनों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई। मुठभेड़ों में दलित व निर्दोष युवकों के मारे जाने पर सवाल उठते रहे। मगर सोनभद्र पुलिस की कार्यप्रणाली में जरा भी परिवर्तन नहीं आया। पुलिस एक-एक कर घटनाओं को अंजाम देती रही। हौसला बुलंद पुलिस ने 21 अगस्त 2002 को बीजपुर थाना क्षेत्र के महुली के जंगल में दो युव
(करहिया मुठभेड़ पर जारी एक जन संगठन की जाँच रिपोर्ट )
कों को पुनः नक्सली बताकर मार दिया। इसमें एक चपकी निवासी महेश्वर गोड़ था जिसका लड़का बसंत चार माह पूर्व करहिया मुठभेड़ में मारा गया था। इसी बीच कुछ युवक चन्दौली व मीजपुर जिलों में भी मारे गये। इस मामले को राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच, भाकपा (माले) के ने जोर-शोर से उठाया। इस मुद्दे पर भी कैमूर क्षेत्र मज़दूर महिला किसान संघर्ष समिति एवं राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच द्वारा सन् 2002 दिसम्बर में दो दिवसीय मानवाधिकार सम्मेलन के तहत जनसुनवाई की गई। जिसमे देश के जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। जनसुनवाई में फर्जी मुठभेड़ में मारे गये लोगों के परिजन, पोटा कानून के तहत निरुद्ध बेगुनाह दलित आदिवासी व भूमि विवाद से संम्बन्धित दलित आदिवासीयों ने अपने वक्तव्य प्रस्तुत किये। इस सम्मेलन के बाद 2003 में बसपा सरकार के सत्तासीन होते ही तमाम 42 पोटा कानून के केसो को वापिस ले लिया । मानवाधिकार संगठनों द्वारा लगातार आवाज़ उठाने पर भी मानवाधिकार हनन के मामले थमे नहीं। 9 मार्च 2003 को राबर्ट्सगंज
( माओवादी कमलेश चौधरी )
कोतवाली पुलिस ने कुसुम्हा गॉंव निवासी श्यामबिहारी व गोइठहरी गॉंव निवासी कान्ता को परसौना गॉंव के जंगल में घाघर नदी के किनारे मार गिराया। पुलिस का कहना था कि यह दोनों नक्सली भवानीपुर घटना की बरसी मनाने के लिए किसी बड़ी घटना को अंजाम देने की फ़िराक में थे। मारे गये श्यामबिहारी के परिजनों ने जब आवाज़ उठायी तो उसके 11 वर्षीय भाई ओम प्रकाश पर पोटा समेत कई मामले लाद दिये गये। उसके चाचा हनुमान, चचेरे भाई विपीन व 9 वर्षीय सुशील को पुलिस अभिलेखों में हार्डकोर नक्सली बना दिया गया। सभी घरबार छोड़कर फरार हो गये । 2007 में विपीन को भी मुठभेड़ में मारे जाने का दावा पुलिस ने किया। हनुमान, ओम प्रकाश जमानत पर रिहा है। नवम्बर 2003 में सुकृत पुलिस चौकी क्षेत्र के चहलवा के जंगल में जगलाल उर्फ गौरी नामक युवक को मारा गया। अक्टूबर 2005 में नौगढ़ में अशोक कोल को मारा गया। 23 अप्रैल 2005 को चोपन थाना क्षेत्र के भरहरी गॉव के जंगल में सूरज कोल व रामवृक्ष कोल को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया। जिन पुलिस वालों पर निर्दोष युवकों के हत्या का ओराप लग रहा था उन पुलिस वालों के कंधे पर एक एक स्टार बढ़ा दिये गये। कथित मुठभेड़ों को सबसे बड़ी सफलता मानकर महकमे में विजयमल यादव, गोरख यादव, रामप्रगट यादव को इन्स्पेक्टर बना दिया। कुछ सिपाहियों का भी ओहदा
( करहिया मुठभेड़ में मारे चार युवक )
बढ़ा दिया गया। इसी तरह मई 2006 में माची थाना क्षेत्र के महुली गॉंव में जयप्रकाश धांगर , नवम्बर 2008 में शत्रुंधन व 9 नवम्बर 2009 को चोपन थाना क्षेत्र में डेढ़ लाख के इनामी कमलेश चौधरी को पुलिस ने मुठभेंड़ में मार गिराया। जबकि कमलेश चौधरी को झाड़खंड़ पुलिस ने सोनभद्र पुलिस को सौंप दिया था जिसकों सूबे के एक आला अफसर ने स्वयं स्वीकारा लेकिन उस पर केस चलानें से पहले उसे मार गिराया गया। इस मुठभेड़ पर भी तमाम मानवाधिकार संगठनों ने सवाल खड़े कर दिये हैं। अब जबकि रनटोला मुठभेड़ काण्ड में 14 पुलिस कर्मियों को सजा हो चुकी है तो एक बार फिर इलाके में हुई सभी मुठभेड़ों की नये सिरे से जॉंच कराने की आवाजे उठने लगी हैं। क्या उत्तर प्रदेश सरकार 50 से भी उपर दलित एवं आदिवासी युवकों के मारे जाने की जॉंच कराकर उनके परिवार के लोगों के ऑसू पोछने का काम करेगी।इन सब मामलों की पड़ताल करने से एक बात तो समझ में आती है कि राज्य द्वारा सुनियोजित तरीके से हिंसा फैलायी जाती है नहीं तो क्यों महाराष्ट्र में एन्काउंटर गुरू प्रदीप शर्मा व सोनभद्र में एन्काउंटर विशेषज्ञ कई दरोगाओं की तैनाती की जाती। देश में इसी दौरान पुलिस का असली घिनौना चेहरा डी0जी0पी राठौड़, प्रदीप शर्मा एन्काउंटर गुरू या फिर रनटोला काण्ड में सज़ा पाने वाले 14 पुलिसकर्मी के चेहरे के रूप में खुल कर सामने आया है।
हत्यारे पुलिस कर्मी पदकों से नवाजे गए
विजय विनीत (सोनभद्र )
एक वर्ष पूर्व देश में जब रूचिका छेड़छाड़ मामले में हरियाणा के पूर्व डीजीपी एस.के.राठौर चर्चाओं में थे व उनके द्वारा किये गये घिनौने कुकृत्य की देश भर में भर्त्सना की जा रही थी, उसी समय उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में छः वर्ष पूर्व हुई मुठभेड़ को स्थानीय फास्ट ट्रैक कोर्ट ने फर्जी करार देते हुए उसमें शामिल 14 पुलिस कर्मियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाने का ऐतिहासिक फैसला दिया। इस फैसले से पूरे देश में एक बार फिर पुलिस की वर्दी शर्मसार व खून के छीटें से लाल हुई तो वहीं न्यायालयीय व्यवस्था के प्रति भी लोगों का विश्वास बढ़ा। इस से न्याय प्रक्रिया व जनवादी ताकतों की जीत हुई। सोनभद्र की अदालत द्वारा सुनाया गया यह फैसला सिर्फ रनटोला मुठभेड़ ही नहीं बल्कि तमाम मुठभेड़ों पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। वैसे भी उत्तर प्रदेश पुलिस मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में देश में सबसे प्रथम पायदान पर है। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में हुई यह मुठभेड़ कोई पहली घटना नहीं थी। जिस पर उंगली उठी हो। जौनपुर के वर्तमान बसपा सांसद धनंजय सिंह को भदोही पुलिस ने चार बदमाशों समेत आठ वर्ष पूर्व मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया था। इसी तरह मीरजापुर जिले के भवानीपुर में 9 मार्च 2001 को 16 लोगों को पुलिस ने मारा था और कहा था कि मारे गये सभी नक्सली थे। इसमें जिस खूंखार नक्सली देवनाथ,लालब्रत,सुरेश, को पुलिस ने ढेर दिखाया था। वह सभी जीवित निकले। उस मुठभेड़ की जॉंच सीबीआई कर रही है।सोनभद्र उत्तर प्रदेश के सर्वाधिक अशिक्षित व पिछड़े जनपदों में शुमार करता है। पिछले एक दशक से यह जिला इस प्रांत के अति नक्सल प्रभावित जिलों में भी शामिल हो गया है। देश का यह पहला जनपद है जिसकी सीमाएं चार-चार राज्यों बिहार झारखण्ड,छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश से लगती है। यह जिला उर्जा राजधानी के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि यहां देश की सर्वाधिक बिजली पैदा की जाती है। वहीं दूसरी ओर यही जिला देश का सबसे गरीब, पिछड़ा व भूमि विवादों में सबसे ऊपर है जहां की सर्वाधिक आबादी आदिवासी जाति के लोगो की है। इसी जिले में 2 सितम्बर 2003 को पिपरी थाना क्षेत्र के रनटोला के जंगल में यहॉं की अपने आप को जाबाज कहने वाली पुलिस ने दो युवकों को लुटेरा बताकर मुठभेड़ में मार गिराया। मारे गये दोनों युवक पड़ोसी प्रान्त झारखण्ड के गढ़वा जनपद के मेराल कस्बे के रहने वाले थे। इसमें एक प्रभात कुमार श्रीवास्तव उर्फ अरूण इलाहाबाद में बी.ए.प्रथम वर्ष का छात्र था। उसके पिता लल्लन प्रसाद श्रीवास्तव राजकीय माध्यमिक विद्यालय मेराल में प्रधानाचार्य थे। दूसरा युवक रमाशंकर साहू पुत्र बंशीधर साहू था। दोनों युवक एक ही गॉंव के थे। इस मुठभेड़ के बाद तमाम मानवाधिकार संगठन पीयूएचआर, भाकपा माले, राष्ट्रीय वन श्रमजीवी मंच समेत तमाम जन संगठनों ने इस फर्जी मुठभेड़ की जांच की आवाज तेज़ की। मारे गये छात्र प्रभात के पिता लल्लन श्रीवास्तव ने भी उच्च न्यायालय,मानवाधिकार आयोग समेत तमाम जगह गुहार लगाई। अन्ततः उनकी फरियाद रंग लायी और तत्कालीन जिलाधिकारी ने मजिस्ट्रेट जॉंच का आदेश ज़ारी कर दिया। मजिस्ट्रेट जांच अपर जिलाधिकारी द्वारा की गयी जिन्होंने सर्व प्रथम मुठभेड़ स्थल देखा और फिर उन तमाम पहलुओं का बारीकी से निरीक्षण किया जिसने इस मुठभेड़ को अंजाम दिया। पोस्टमार्टम की रिर्पोट पर अध्ययन करने पर उन्होंने अपनी रिर्पोट में लिखा कि शरीर पर जिस तरह से गोली के निशान बने हुये हैं वह 60 से 70 फीट से चलाई गयी गोली से नहीं बन सकते हैं, बल्कि गोली बहुत ही पास से चलाई गई। अपर जिलाधिकारी की यही रिर्पोट सी0बी0सी0आई0डी द्वारा जांच करने का आधार बनी। पुलिस ने मुठभेड़ की कहानी में दर्शाया था कि लूटेरे लूट के बाद उसी स्थान पर माल बांटने आये थे। माल बांटने के लिए वह फुसफुसाहट में बातचीत कर रहे थे। जिसे 60-70 फीट की दूरी से सुना गया। उनकी फुसफुसाहट सुनकर जब पुलिस ने उन्हें देखा और आत्म समर्पण के लिए कहा तो लूटेरो ने फायर शुरू कर दिया। आत्म रक्षार्थ पुलिस ने भी गोली चलायी। जिससे दोनों युवक मारे गये। अपर मजिस्ट्रेट ने 17 जनवरी 04 को अपनी जाँच आख्या में लिखा था कि कथित बदमाशों को पकड़ कर लाया गया था व बाद में मुठभेड़ में मारा गया था। इसी खुलासे के बाद जांच सी.बी.सी.आई.डी को सौंपी गयी जिसके तहत इस मामले में गहन जांच शुरू हो गयी। 02जॉंच के दौरान मुठभेड़ से सम्बन्धित तमाम पहलुओं पर विचार किया गया। जांच दल मारे गये दोनों युवकों के पिता व उन तमाम लोगों से मिले जहां इस घटना से सम्बन्धित बातें जुड़ी थी। जांच के बाद सीबीसीआईडी के निरीक्षक ने घटना से सम्बन्धित थाना क्षेत्र पिपरी में 21 फरवरी 2006 को 15 पन्द्रह पुलिस कर्मियों के खिलाफ मुठभेड़ को फर्जी करार देते हुए हत्या समेत विभिन्न धाराओं में प्राथमिकी दर्ज करा दी । इसमें दुद्धी कोतवाली क्षेत्र के तत्कालीन एसएसआई जयनाथ मिश्र, बभनी थानाध्यक्ष रामेश्वर नाथ, बीजपुर थानाध्यक्ष कमलेश्वर प्रताप सिंह,चौकी इंचार्ज म्योरपुर राजेश कुमार सिंह, कास्टेबिल राजेश सिंह , केश बिहारी,शाहजहां खॉं, अशोक कुमार,प्रमोद कुमार, दिनेश, सतीश कुमार, चन्द्रिका यादव, राणा प्रताप सिंह, शिवशंकर सिंह, व रविन्द्रनाथ मौर्य शामिल थे। सीबीसीआईडी द्वारा दर्ज करायी गयी प्राथमिकी में उल्लेख किया कि मारे गये युवक प्रभात कुमार, रमाशंकर व दो अन्य युवक रामप्रवेश व जय शंकर झारखण्ड से ट्रेन पकड़कर अपनी रिश्तेदारी मे जा रहे थे। झारोखास रेलवे स्टेशन पर रेल की क्रासिंग होने के कारण जब ट्रेन रूकी, इसी बीच पुलिस वहां पहुंच गयी और इन्हें पकड़ लिया। पुलिस द्वारा रामप्रवेश व जय शंकर को पुनः बस पर बैठाकर वहां से 50कि0मी दूर डाला चौकी पर लाया गया जहां से बाद में उन्हें छोड़ दिया गया। प्रभात व रमाशंकर को ट्रेन से 25 कि0मी दूर रेनुकूट लाया गया। फिर रेनुकूट से 9 कि0मी दूर रनटोला के जंगल में इस मुठभेड़ को अंजाम दिया गया। अपराध शाखा की विवेचना से भी मृतक प्रभात कुमार व रमाशंकर को झारोखास रेलवे स्टेशन से पकड़कर ले जाने की बात प्रमाणित की है जिससे पुलिस द्वारा बनायी गयी मुठभेड़ की कहानी फर्जी पायी गयी। इस मामले में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद एक-एक कर 14 पुलिस कर्मियों ने अदालत में आत्म समर्पण कर दिया। जबकि एक दरोगा जयनाथ मिश्र अदालत का फैसला आ जाने के एक साल बाद भी फरार चल रहे हैं। इस पूरे मामले में कुल 16 गवाहों का बयान हुआ। 4 जनवरी 2010 को अपर जनपद एवं सत्र न्यायाधीश फास्ट ट्रैक कोर्ट का कक्ष खचाखच भरा हुआ था। परिसर में भी मीडिया कर्मी व तमाम लोग बड़ी संख्या में मौजूद थे। सभी को इस चर्चित काण्ड के फैसले का इन्तजार था। माननीय न्यायाधीश ने जैसे ही सभी नामजद पुलिस कर्मियों पर अपराध साबित किया मृतक के पिता लल्लन प्रसाद की ऑंखों से ऑंसू निकल पड़े, वहीं अदालत में मौजूद कुछ पुलिस कर्मी फफककर रो पड़े। शायद उन्हें अपने किये का आभास हो चुका था। इस मामले में अदालत ने सभी पुलिस कर्मियों को आजीवन कारावास की सुनाई। गोली चलाने वालों पर एक-एक लाख व अन्य पर 50.-50 हजार रूपये का अर्थदण्ड भी लगाया। आजीवन कारावास के दौरान तीन साल सश्रम कारावास की सजा भी सुनाई। इस फैसले से पुलिस को महकमे को सांप सूघ् गया और विभाग मे अफरा-तफरी मच गयी। रनटोला फर्जी मुठभेड़ मामले में अपने फैसले में सत्र न्यायाधीश फास्ट ट्रैक कोर्ट ने यह साफ लिखा है ‘कि पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य से यह साबित है कि उक्त चारों व्यक्तियों को एक साथ पकड़ा गया था तथा दोनों मृतकों को फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया था। मुठभेड़ स्थल से दोनों मृतकों को आयी चोटे यह साबित कर रही है कि जिस तरह से पुलिस मुठभेड होना बता रही है वह फर्जी है। पुलिस द्वारा बतायी गयी कहानी किसी भी परिस्थिति मे विश्वास किये जाने योग्य नहीं है। दोनों मृतकों को आयी चोटे यह साबित कर रही है कि केवल 10-15 फीट की दूरी से गोली चलायी गयी थी। अतः10-15 फीट की दूरी पर उपस्थित ऐसे पुलिस पार्टी जिनके पास ए.के.47 एवं एस.एल.आर.जैसे असलहे हो उनके ऊपर दो बदमाश जिनके पास एक देशी कट्टा व 303 बोर का कट्टा हो के द्वारा हमला करने की कल्पना नहीं की जा सकती। परिस्थितियां यह साबित कर रही है कि पुलिस पार्टी द्वारा एक सुनियोजित ढंग से मृतकों की हत्या की गयी है। पुलिस अभियुक्तों द्वारा आत्म बचाव के सम्बन्ध में कोई साक्ष्य प्रस्तुत न करके अपने आत्म बचाव के तर्को को साबित नहीं किया है। जो न्यायालय को इस निष्कर्ष की ओर ले जा रही है कि वाकई में दिनांक 02-09-03 को रनटोला के जंगल में जो पुलिस मुठभेड़ बतायी जा रही है, वह मुठभेड़ फर्जी थी। निःसंदेह यह हत्या उत्तर प्रदेश की पुलिस उपनिरीक्षक एवं सिपाहियों द्वारा दो निर्दोष लोगों को पकड़कर जंगल में ले जाकर पुलिस बल से मुठभेड़ दिखाकर कारित की गयी है। यही नहीं सरकारी अभिलेखों में हेराफेरी करने के दृष्टिकोण से पुलिस की जी.डी. में भी उलट फेर किया है।’ इस मामले पर माननीय न्यायाधीश ने गंभीर टिप्पणी करते हुए लिखा कि ‘‘अभियुक्तों द्वारा कारित यह कृत्य घोर निन्दनीय एवं गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। जब रक्षक ही भक्षक हो जायेगा तो जन सामान्य की सुरक्षा व्यवस्था असंभव हो जायेगी तथा जन सामान्य का विश्वास इस एजेन्सी से उठ जायेगा।’’ सी.बी.सी.आई.डी. के लोक अभियोजक मे तो अपनी मांग में कहा था कि जिस संस्था पर जन सामान्य की रक्षा करने का दायित्व हैं उन्हीं के द्वारा दो लोगों को पकड़कर उनकी हत्या की गयी है, इस तरह से इन दोषी अभियुक्तो को मृत्यु दण्ड से कम सज़ा नहीं देनी चाहिये। अब जब मुठभेड के लगभग छः साल बाद यह फैसला आया है और दोषी पुलिस कर्मियों को सजा हो गयी है तो तत्कालीन पुलिस अधीक्षक के. सत्यनारायणा पर भी हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग ज़ोर पकड़ने लगी है। गौर तलब है कि यह घिनौना और नृंशस कार्य केवल पुलिस की ही उपज नहीं है। इस कार्य के लिये जिले के पत्रकारों के एक वर्ग ने पुरज़ोर तरीके से पुलिस का साथ दिया था। जो सच आज इस फैसले के बाद उजागर हुआ है। पुलिस अधीक्षक ने मुठभेड़ के पहले रेनुकूट के एक अतिथि गृह में कुछ पत्रकारों के साथ बैठक की थी। उन्होने पत्रकारों से मुठभेड़ में इन दोनों युवकों को मारने के लिये सहयोग की अपील की थी और कुछ पत्रकारों ने दोनों युवकों को गोली मारने की हामी भर दी। इस घटना का मैं खुद चश्मदीद गवाह हूं मैंने पत्रकारों के किये जा रहे इस कृत्य का विरोध किया लेकिन मेरी ज़बान और कलम दोनों को रोक दिया गया। पत्रकारों और पुलिस के इस बेमेल गठजोड़ ने दो परिवारों के घरों की खुशियां चन्द मिनट में ही छिन ली। वह कलम जो अन्याय का विरोध करने की क्षमता रखती थी, स्वयं खूनी बन गयी। तब मुझे लगा था कि हमारे जैसे लोगों के हाथ में रहते हुए पहली बार कलम हार गयी थी। चाहकर भी किसी बड़े अखबार ने घटना की सच्चाई उजागर नहीं की थी। फिर भी पत्रकारों के इस घिनौने कृत्य को इलाहाबाद से छपने वाले एक साप्ताहिक अखबार ‘ न्यायाधीश’ ने मेरी रिर्पोट को छापा।यह पहली बार हुआ है कि रनटोला मामले में सत्र न्यायालय द्वारा इतना अहम फैसला आ जाने के बाद मानवाधिकार संगठनों, बुद्धिजीवीयों, प्रगतिशील समुदायों द्वारा यह मांग उठाई जा रही है कि उन पत्रकारों को भी तत्कालीन पुलिस अधीक्षक के साथ सह अभियुक्त बनाया जाये जिन्होंने उस बैठक में हिस्सा लिया था जहां दो मासूमों की हत्या करने का फैसला हुआ। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक वर्तमान में सोनभद्र के पड़ोसी जिले मीरजापुर में तैनात है। मगर इस मुद्दे पर वह मीडिया से कोई बात नहीं करना चाहते। मृतक प्रभात के पिता लल्लन श्रीवास्तव इस फैसले पर खुश हैं तो लेकिन इसे वह आधी जीत बताते है। उनका कहना है कि जब तक तत्कालीन एस.पी. को सज़ा नहीं होगी तब तक वे चैन से नहीं बैंठेगे न ही उनके बेटे की आत्मा को शांति मिलेगी। इस मुठभेड़ में दोषी अधिकारियों व पत्रकारों को सज़ा मिलने से लल्लन प्रसाद के बेटे की आत्मा को तो शांति मिलेगी लेकिन इस जिले में ऐसे सैंक
ड़ों मां बाप को कब शांति मिलेगी जिनके बच्चों को भी यहां की पुलिस ने बेरहमी से मुठभेड़ दिखा मौत के घाट उतार दिया। रनटोला मुठभेड़ तो मात्र एक नमूना है सोनभद्र पुलिस के चाल, चलन व चरित्र का , इस इलाके में इस तरह की ऐसी पचासों मुठभेड़ हुई हैं, जिनमे पुलिस द्वारा दलितों व आदिवासीयों को गोलियों से भून डाला गया है। यह हत्यायें अति नक्सल प्रभावित सोनभद्र, चन्दौली व मीरजापुर जिले में तथाकथित माओवादीयों को मार गिराने के नाम पर हुई हैं। इन तीनों जिलों में आदिवासी व दलित काफी संख्या में है व एक समय में इन जंगलों पर आदिवासियों का ही राज हुआ करता था। आज वहीं आदिवासी शोषण, उत्पीड़न का शिकार है। इस इलाके में जितनी इनकी संख्या है कही उससे अधिक संख्या उनके उत्पीड़न, शोषण व अन्तहीन दुःख-दर्द की है। जब इस शोषण, उत्पीड़न व अपने हकों को लेकर दलित व आदिवासी अपनी आवाज़ बुलंद करने लगे तो उन्हें नक्सली करार कर उनके तमाम हकों को छीनने व जनवादी ताकतो को समाप्त करने का काम किया गया। पिछले एक दशक से इस समूचे आदिवासी इलाके में सत्ता पोषित कुचक्र का शिकार हजारों निरीह बने हैं। उत्तर प्रदेश में सिर्फ सरकारें बदलती रही। उनका नजरिया व कार्यप्रणाली एक जैसा रहा । प्रदेश की बागडोर भाजपा,सपा व बसपा के बीच हस्तांतरित होती रही। मुख्यमंत्री के रूप में रामराज की बात करने वाले राजनाथ सिंह दलितों की शुभचिंतक मायावती व समाजवाद के पोषक मुलायम सिंह प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते रहें। किसी भी सरकार के कार्यकाल में दलित बध का सिलसिला रूका नहीं। इस इलाके में जहां तमाम दलित युवकों को फर्जी मुठभेड़ों में मारा गया।वहीं तमाम परिवारों के लोगों पर नक्सलियों का शरणदाता होने का आरोप लगा। किसी के घरों में अगर हथियार बन्द दस्ते के लोग जबरिया घुसकर खाना खायें तो वह भी जेल गया। इन सरकारों के कार्यकाल में पुलिसिया कार्यप्रणाली में कोई बदलाव नहीं आया। जो पुलिस की मुखबीरी नहीं किया उसके परिवार की महिलाओं व लड़कियों तक को नक्सली बताकर जेल भेजा गया। शायद सोनभद्र प्रदेश का पहला जिला होगा, जहॅं जनवादी तरीके से हक-हकूक की बात करने वाली महिलाओं पर रासुका व गैंगेस्टर की कार्यवाही हुई।फर्जी मुठभेड़ों का यह सिलसिला सन् 2001 से शुरू हुआ। सोनभद्र पुलिस ने 21 जनवरी 2001 को पन्नूगंज थाना क्षेत्र के खदरा गांव से रामेश्वर नामक दलित युवक को (जो अपनी ससुराल आया था ) उठाकर धंधरौल बांध के पास गोली मार दी। इस पर भाकपा (माले) ने जहां एक पखवारे तक जिला मुख्यालय पर क्रमिक अनशन किया वहीं उस समय बहुजन समाज पार्टी ने भी इस पर खुब हो-हल्ला मचाया। अभी यह शोर-गुल थमा भी नहीं था कि सोनभद्र पुलिस ने चन्दौली के एक किसान नेता गुलाब हरिजन को चुर्क पहाड़ी पर 08 फरवरी 2001 को मुठभेड़ में मार गिराया। गुलाब के मारे जाने से सोनभद्र, चन्दौली व मीरजापुर के लोग भौचक रह गये। गुलाब इन जिलों में जनवादी किसान नेता के रूप मे जाने जाते थे। वह जिला पंचायत का चुनाव भी लड़े थे। पुलिस ने उनका सम्बन्ध माओवादी संगठन से होना बताया। इस पर भाकपा (माले) के राज्य सचिव का.अखिलेन्द्र प्रताप सिह ने पुलिस को माओवादीयों व गुलाब के सम्बन्ध उजागर करने की चुनौती दी। बसपा सरकार के वर्तमान मंत्री इन्द्रजीत सरोज राबर्ट्सगंज सदर तहसील में आयोजित इस धरने में शामिल हुये थे। वर्तमान विधायक सत्य नारायण जैसल पूर्व विधायक परमेश्वर दयाल, भदोही के पूर्व सांसद नरेन्द्र कुशवाहा, रमेश वर्मा, जिलाध्यक्ष बसपा समेत तमाम कार्यकर्ताओं ने रामेश्वर की मुठभेड़ को हत्या बताया था व इस सम्बन्ध में मुख्य मंत्री के नाम पत्र भी लिखा पूरी घटना की सीबीआई जॉंच की मांग की गयी थी। लेकिन तत्कालीन भाजपा सरकार द्वारा इन मुठभेड़ों की जांच करने की कोई भी कार्यवाही में नहीं की गई । इसके बाद तो मानो पुलिस को लाईसेंस मिल गया और सन् 2002 में मीरजापुर के भवानीपुर में इन तीनों जनपदों की पुलिस ने होलिका दहन के दिन 16 दलितों व आदिवासीयों को नक्सली बताकर उनके खून से होली खेली। जिन डेढ़ दर्जन लोगों को पुलिस ने निर्ममता से गोली मारी उसमें एक 11 वर्षीय बालक कल्लू भी था। मारे गये लोगों में पुलिस रिकार्ड मे खूंखार नक्सली के रूप में देवनाथ व लालब्रत का भी नाम शामिल था। पुलिस ने सभी शवो का आनन-फानन में मीरजापुर में परीक्षण कराया । इसलिये शव परिजनों को न सौंपकर गंगा नदी के हवाले कर दिये गये। इसके बाद पुलिस ने दस मृतकों के नामों की सूची जारी की, व शेष को अज्ञात बताया। इस सूची मे जिस सुरेश बियार को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया था। उसने घटना के एक सप्ताह बाद 14 मार्च 2002 को मीरजापुर कचहरी में भवानीपुर हत्या काण्ड के विरोध में बुलाई गयी सभा में उपस्थित होकर पुलिस को अपने जिन्दा होने का सबूत दिया। इसके बाद तो पीयूसीयूएल ,पीयूएचआर ,पीयूडीआर ,जैसे मानवाधिकार संगठनों ने इस मुठभेड़ की पर्त और पुलिस की बखिया उधेड़नी शुरू की। मानवाधिकार संगठनों के दबाव के चलते ही भवानीपुर काण्ड की मानवाधिकार आयोग द्वारा जांच की गयी लेकिन दुर्भाग्यवश अभी तक यह रिर्पोट ज़ारी नहीं की गयी है। इसी बीच मारे गये देवनाथ व लालब्रत ने भी नौगढ़ में अपने को जिन्दा होने का दावा कर दिया। आज तक पुलिस यह बताने में नाकाम है कि देवनाथ,लालब्रत, सुरेश बियार की जगह जो मारे गये वे कौन थे। इसे मानवाधिकार संगठनों ने नरसंहार करार दिया और तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराते हुए पीयूसीएल ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल की। दुर्भाग्यवश यह याचिका उच्च न्यायालय द्वारा यह कह कर स्वीकार नहीं की गयी ‘ कि इस याचिका में कुछ खास नहीं है’ । पुलिस द्वारा भवानीपुर मुठभेड़ का जश्न मनाया गया, तत्कालीन डीजीपी एम.सी.द्विवेदी ने इस मुठभेड़ को जायज़ ठहराया और कहा कि ऐसी मुठभेड़ तो होती रहेगी। वहीं वाराणसी के आईजी वी.के.सिंह ने पुलिस कर्मियों को बधाई दी जो कि स्वयं भवानीपुर में मुठभेड़ के दौरान मौजूद थे। लेकिन भवानीपुर हत्या काण्ड ने प्रदेश स्तर पर तमाम मानवाधिकार संगठनों, प्रगतिशील ताकतों व बुद्धिजीवी वर्ग को लामबंद किया व इस हत्याकाण्ड के विरोध में कई कार्यक्रम हुए। सोनभद्र के मुख्यालय राबर्ट्सगंज में इस फर्जी मुठभेड़ को लेकर पीपुल्स यूनियन फार ह्यूमन राइट्स द्वारा दो दिवसीय मानवाधिकार सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसमें पूर्व न्यायाधीश इलाहाबाद उच्च न्यायालय वी.के.मेहरोत्रा व पूर्व न्यायाधीश पंजाब राजेन्द्र सच्चर समेत पीयूसीएल के उपाध्यक्ष चितरंजन सिंह , पूर्व जिला जज भगवन्त सिंह, पूर्व शिक्षा निदेशक उत्तर प्रदेश डा. कृष्णा अवतार पाण्डेय, सम्पादक अरूण खोटे, कामरेड अखिलेन्द्र प्रताप सिंह, का0 सलीम समेत कई मानवाधिकार कार्यकर्ता शामिल हुए। माननीय न्यायाधीश श्री सच्चर ने भवानीपुर की घटना को पंजाब से जोड़ा और कहा किवर्षों पूर्व बसों से उतारकर छः निर्दोष युवकों की हत्या कर दी गयी। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सीबीआई से करायी गयी जांच में मुठभेड़ फर्जी पायी गयी। ठीक यहीं स्थिति भवानीपुर की है। उन्होंने इस घटना का सबसे दुःखद पहलू इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा इन फर्जी मुठभेड़ों पर याचिका को स्वीकार न करना बताया। लेकिन श्री सच्चर द्वारा उत्तर प्रदेश में हो रहे मानवाधिकार हनन के मामले के सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय को भेजे गये पत्र पर ही उच्चतम न्यायालय ने मानवाधिकार आयोग को भवानीपुर काण्ड की जांच करने के आदेश दिये। सीबीआई जॉंच भी लम्बित है लेकिन
(रन टोला मुठभेड़ में मारे गए दोनों युवक )लगभग दस वर्ष बाद भी जॉंच रिपोर्ट सार्वजनिक न होना केंद्र व राज्य सरकारों की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़ा करती है। साथ ही यह भी आभास होता है कि सरकारें आज भी पूरी तरह सामन्ती व्यवस्था के तहत संचालित हैं और उन्हें दलितों व निर्दाषों के मुद्दे से कोई लेना-देना नहीं।भवानीपुर हो चाहे, सोनभद्र का करहिया अथवा चन्दौली में हुई मुठभेड़े। ऐसी हिंसा की शुरूआत क्यों हुई इसके पीछे के कारणों पर गौर किया जाये तो उत्तर प्रदेश की तत्कालीन भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह इस नरसंहार के लिये कहीं न कहीं जरूर दोषी हैं। राज्य द्वारा हिंसा का यह क्रूर खेल तब शुरू हुआ जब 13 अक्टूबर 2000 को सोनभद्र के करमा थाना क्षेत्र में रात में मुठभेड़ के दौरान चन्दौली के नौगढ़ थानाध्यक्ष ओ.पी. सिंह व सिपाही वेद प्रकाश की कथित माओवादीयों की गोली लगने से मौत हो गयी। इस पर मृत थानाध्यक्ष व सिपाही को श्रद्धांजलि देने पहुंचे मुख्यमंत्री श्री राजनाथ सिंह ने पुलिस को ललकारा और कहा कि ‘‘ अगर वे एक मारे तो आप चार मारे।’’ उनका यह बयान इस समूचे आदिवासी इलाके के लिए शोषण उत्पीड़न व दमन का कारण बन गया। उनके इस बयान के बाद सोनभद्र, चन्दौली व मीरजापुर में मुठभेड़ों की बाढ़ आ गयी। भवानीपुर की घटना में शामिल तो इन तीनों जिलों की पुलिस थी। लेकिन पदोन्नति व पुरस्कार सिर्फ मीरजापुर पुलिस को मिला। सोनभद्र व चन्दौली पुलिस ने भी मीरजापुर पुलिस की तरह पदोन्नति व पुरस्कार पाने के लालच में माओवादीयों के नाम पर दलितों व आदिवासीयों की हत्या का अभियान शुरू कर दिया। मई 2001 में करमा थाने की पुलिस ने टिकुरिया गॉंव निवासी राजेन्दर हरिजन को मार गिराया। राजेन्दर क्षेत्र में अपनी बिरादरी के स्वाभिमान, सम्मान व हक़ की आवाज़ उठाने लगा था। इसे भी पुलिस ने नक्सली की सूची में शामिल कर दिया था। इसी वर्ष जुलाई के प्रथम सप्ताह में पन्नूगंज पुलिस ने बगौरा गॉंव निवासी बचाउ हरिजन को मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया। जबकि रामगढ़ बाजार के तमाम लोगों का कहना था कि पुलिस ने उसे बाजार में खरीददारी करते वक्त पकड़ा। इसी तरह सितम्बर और नवम्बर में भी एक-एक दलित युवकों की पुलिस ने हत्या की। अप्रैल 2002 में सोनभद्र के बीजपुर थाना क्षेत्र के करहिया गॉंव में पुलिस ने ठीक भवानीपुर की तर्ज पर चार युवकों को गोली मार दी। इसमें बसंत,राजू व सुरेश नामक युवक की ही शिनाख्त हुई जो चपकी गॉंव के थे। बाद में सुरेश जिन्दा निकला। आज सुरेस अपने गावं में हैं, इस मुठभेड़ में मारे गये अन्य दो लड़के कहां के थे आज तक उनका पता नहीं चला। पुलिस ने तो अगस्त २००२में मानवता व कानून की सारी हदे तोड़ दी। पन्नूगंज थाना क्षेत्र के केतार गॉंव निवासी मदन कुशवाहा, चोपन थाना क्षेत्र के कन्हौरा गॉंव अपने ससुराल गया हुआ था। वहां से अपनी पत्नी को लेकर चोपन बाजार आया फिर बस पकडकर राबर्ट्सगंज के लिए चला।चोपन सोन नदी का पुल पार करते ही पुलिस ने उसे उसकी पत्नी के सामने बस से उतार लिया। फिर राबर्ट्सगंज कोतवाली पुलिस ने उसे भी मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया। इस मामले को तत्कालीन विधायक परमेश्वर दयाल ने विधान सभा में उठाया लेकिन दोषी पुलिसजनों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई। मुठभेड़ों में दलित व निर्दोष युवकों के मारे जाने पर सवाल उठते रहे। मगर सोनभद्र पुलिस की कार्यप्रणाली में जरा भी परिवर्तन नहीं आया। पुलिस एक-एक कर घटनाओं को अंजाम देती रही। हौसला बुलंद पुलिस ने 21 अगस्त 2002 को बीजपुर थाना क्षेत्र के महुली के जंगल में दो युव
(करहिया मुठभेड़ पर जारी एक जन संगठन की जाँच रिपोर्ट )कों को पुनः नक्सली बताकर मार दिया। इसमें एक चपकी निवासी महेश्वर गोड़ था जिसका लड़का बसंत चार माह पूर्व करहिया मुठभेड़ में मारा गया था। इसी बीच कुछ युवक चन्दौली व मीजपुर जिलों में भी मारे गये। इस मामले को राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच, भाकपा (माले) के ने जोर-शोर से उठाया। इस मुद्दे पर भी कैमूर क्षेत्र मज़दूर महिला किसान संघर्ष समिति एवं राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच द्वारा सन् 2002 दिसम्बर में दो दिवसीय मानवाधिकार सम्मेलन के तहत जनसुनवाई की गई। जिसमे देश के जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। जनसुनवाई में फर्जी मुठभेड़ में मारे गये लोगों के परिजन, पोटा कानून के तहत निरुद्ध बेगुनाह दलित आदिवासी व भूमि विवाद से संम्बन्धित दलित आदिवासीयों ने अपने वक्तव्य प्रस्तुत किये। इस सम्मेलन के बाद 2003 में बसपा सरकार के सत्तासीन होते ही तमाम 42 पोटा कानून के केसो को वापिस ले लिया । मानवाधिकार संगठनों द्वारा लगातार आवाज़ उठाने पर भी मानवाधिकार हनन के मामले थमे नहीं। 9 मार्च 2003 को राबर्ट्सगंज
( माओवादी कमलेश चौधरी )कोतवाली पुलिस ने कुसुम्हा गॉंव निवासी श्यामबिहारी व गोइठहरी गॉंव निवासी कान्ता को परसौना गॉंव के जंगल में घाघर नदी के किनारे मार गिराया। पुलिस का कहना था कि यह दोनों नक्सली भवानीपुर घटना की बरसी मनाने के लिए किसी बड़ी घटना को अंजाम देने की फ़िराक में थे। मारे गये श्यामबिहारी के परिजनों ने जब आवाज़ उठायी तो उसके 11 वर्षीय भाई ओम प्रकाश पर पोटा समेत कई मामले लाद दिये गये। उसके चाचा हनुमान, चचेरे भाई विपीन व 9 वर्षीय सुशील को पुलिस अभिलेखों में हार्डकोर नक्सली बना दिया गया। सभी घरबार छोड़कर फरार हो गये । 2007 में विपीन को भी मुठभेड़ में मारे जाने का दावा पुलिस ने किया। हनुमान, ओम प्रकाश जमानत पर रिहा है। नवम्बर 2003 में सुकृत पुलिस चौकी क्षेत्र के चहलवा के जंगल में जगलाल उर्फ गौरी नामक युवक को मारा गया। अक्टूबर 2005 में नौगढ़ में अशोक कोल को मारा गया। 23 अप्रैल 2005 को चोपन थाना क्षेत्र के भरहरी गॉव के जंगल में सूरज कोल व रामवृक्ष कोल को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया। जिन पुलिस वालों पर निर्दोष युवकों के हत्या का ओराप लग रहा था उन पुलिस वालों के कंधे पर एक एक स्टार बढ़ा दिये गये। कथित मुठभेड़ों को सबसे बड़ी सफलता मानकर महकमे में विजयमल यादव, गोरख यादव, रामप्रगट यादव को इन्स्पेक्टर बना दिया। कुछ सिपाहियों का भी ओहदा
( करहिया मुठभेड़ में मारे चार युवक ) बढ़ा दिया गया। इसी तरह मई 2006 में माची थाना क्षेत्र के महुली गॉंव में जयप्रकाश धांगर , नवम्बर 2008 में शत्रुंधन व 9 नवम्बर 2009 को चोपन थाना क्षेत्र में डेढ़ लाख के इनामी कमलेश चौधरी को पुलिस ने मुठभेंड़ में मार गिराया। जबकि कमलेश चौधरी को झाड़खंड़ पुलिस ने सोनभद्र पुलिस को सौंप दिया था जिसकों सूबे के एक आला अफसर ने स्वयं स्वीकारा लेकिन उस पर केस चलानें से पहले उसे मार गिराया गया। इस मुठभेड़ पर भी तमाम मानवाधिकार संगठनों ने सवाल खड़े कर दिये हैं। अब जबकि रनटोला मुठभेड़ काण्ड में 14 पुलिस कर्मियों को सजा हो चुकी है तो एक बार फिर इलाके में हुई सभी मुठभेड़ों की नये सिरे से जॉंच कराने की आवाजे उठने लगी हैं। क्या उत्तर प्रदेश सरकार 50 से भी उपर दलित एवं आदिवासी युवकों के मारे जाने की जॉंच कराकर उनके परिवार के लोगों के ऑसू पोछने का काम करेगी।इन सब मामलों की पड़ताल करने से एक बात तो समझ में आती है कि राज्य द्वारा सुनियोजित तरीके से हिंसा फैलायी जाती है नहीं तो क्यों महाराष्ट्र में एन्काउंटर गुरू प्रदीप शर्मा व सोनभद्र में एन्काउंटर विशेषज्ञ कई दरोगाओं की तैनाती की जाती। देश में इसी दौरान पुलिस का असली घिनौना चेहरा डी0जी0पी राठौड़, प्रदीप शर्मा एन्काउंटर गुरू या फिर रनटोला काण्ड में सज़ा पाने वाले 14 पुलिसकर्मी के चेहरे के रूप में खुल कर सामने आया है।
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