विजय विनीत
25 फरवरी। सोनभद्र जिले में वनाधिकार कानून के तहत 31 सौ आदिवासी व दलित परिवार जमीने पाकर खुश हैं तो वहीं तमाम लोग वन विभाग के उत्पीड़न से दर दर की ठोकरे खाने को मजबूर हैं। राबटर््सगंज तहसील क्षेत्र के पडरक्ष गांव के मगरदह टोले का नजारा देख कर किसी का भी दिल दहल सकता है। लेकिन शायद वन विभाग व पुलिस मकहमे के लोगो का दिल नही पसिजता। सात माह पूर्व मगरदह गॉव में पुलिस व वन विभाग के लोगों ने मिल कर जो ताण्डव किया उससे दो सौ आदिवासी व दलित परिवार गॉव से पलायन कर गया है। साथ ही दर्जनों गॉव वालों के ऊपर कई गंभीर आपराधिक धाराओं में मुकदमा भी दर्ज कर दिया गया है। गॉव के बुद्धिनारायण का कहना है कि वगैर किसी पूर्व सूचना के वन विभाग ने कई वर्षो पहले हमारी जमीन अपने नाम कर ली हम लोग उसपर जोत कोड़ करते रहे। कई बार वन महकमे के लोगों ने लाठिया बरसाई। हम दो सौ परिवार के लोग वर्ष 2004 में पडरक्ष से आकर इस टोले में आवाद हो गये जिसका जिता जागता सबूत ये पुराने मकानों कि दिवाले स्वयं है। वनाधिकार विधेयक लागू होते ही वन महकमें के लोग यहा से उजाड़ने की फिराक मे पड़ गये। 22 से 24 अगस्त के बीच तीन दिन तक लगातार कोन पुलिस व कोन वन रेंज के कार्यालय के लोग दो सौ मकानों को गिराते रहे। घर में रहने वाले लोगों को लठियातें रहे। घरो मे रखी सारी सामाने ढोकर ले जाते रहे लेकिन हमारे उपर हो रही ज्यादतियों के बारे मे किसी ने कुछ नही कहां और सूना। सोनभद्र का सारा प्रशासन
मामले को दबाने मे लगा रहा। इस टोले के जिस भी आदिवासी ने अपने हंक हकूक के लिये विरोध किया उसे कोन पुलिस ने आपराधिक धाराओं में उठाकर जेल भेंज दिया। जमानत दारों को भी पुलिस ने हड़काया। मायावती सरकार ने शासना देश जारी कर साफ निर्देश दिया था कि मई 2007 तक जिस भूमि पर जो व्यक्ति काबिज होंगा वह भूमि उसके नाम होंगी। लेकिन यहां से हमे पूरी तौर पर उजाड़ दिया गया है। हम लोगों में विरोध स्वरूप बीते 30 नवम्बर को कोन थाने का घेराव किया। उसके बाद से लगातार पुलिस व वन महकमें के लोग धमकी दे रहे है। मगरदह टोले मे जाने पर नगी खड़ी दिवाले टूटे खपरैल बिखरी लकड़ीया व पशुओं के बाधने के लिए गड़े खूटे इस बात की गवाही दे रहे है की इस स्थान पर लोग काफी दिनो से आवाद रहे होंगे। जिस समय यहां मिट्टी के दो सौ मकान बन रहे थे। उस समय वन महकमे के लोग कहा थे। मिट्टी की दिवाल रातो रात खड़ी नही की जा सकती। पॉच फिट उची दिवाल बनाने में कम से कम 45 दिन का समय लगता है। एक तरफ जब सरकार आदिवासी व दलित समुदाय के लोगों को वनाधिकार विधेयक के तहत काबिज वन भूमि पर मालिकाना हक दे रही है तो मगरदह में इस तरह की घट
ना पर जिला प्रशासन व सरकार चुप क्यों है लोग समझ नही पा रहे है। मगरदह मे रहने वाले दो सौ परिवार के लोग आज दुसरे गांव में खाना बदोस की तरह अपनी जिन्दगी गुजार रहे है।
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