मुठभेड़ की मजिस्ट्रेटी जांच के आधार पर 14 पुलिस कर्मियों को हुआ था आजीवन कारावास
विजय विनीत
8/फरवरी। रनटोला मुठभेड़ के फर्जी साबित होने के बाद एक और मुठभेड़ की मजिस्ट्रेटी जाॅंच गुरूवार को समाप्त हुई। इसे लेकर एक बार फिर पुलिस महकमा सकते में हैै। जिस युवक को नक्सली दिखाकर पुलिस ने नौ साल पहले मार गिराया था उसके परिजन हलफनामा दाखिल कर मजिस्ट्रेट के समक्ष सारी हकीकत प्र्रस्तुत कर दिये हंै। जनपद में कार्यरत तमाम मानवाधिकार संगठनों को एक बार फिर दूध का दूध और पानी का पानी होने की उम्मीद जगी है। एक माह पूर्व सोनभद्र की फास्ट ट्रैक कोर्ट नें रनटोला मुठभेड़ में चैदह पुलिस कर्मियों को उम्र कैद की सजा सुनायी। इसके बाद कई जन संगठनोें ने जनपद में हुई तमाम मुठभेड़ों पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया। इसे गंभीरता से लेते हुए उप जिलाधिकारी सदर को जिला मजिस्ट्रेट ने 26 जुलाई 2001 को हुई एक मुठभेड़ की मजिस्ट्रेटी जाॅंच करने का जिम्मा सौंप दिया। उप जिलाधिकारी सदर ने इसमें 7 फरवरी 2010 तक किसी भी तरह का साक्ष्य प्रस्तुत करने का समय नियत कर दिया। पुलिस ने 26 जुलाई 2001 को पन्नूगंज थाना क्षेत्र के ढोसरा गाॅव के जंगल में एक युवक को मार गिराया था। पुलिस का कहना था कि मारा गया युवक नक्सली था। लगभग तीन साल बाद 3 अक्टूबर 2004 को मारे गये युवक की पहचान पुलिस ने नन्दलाल कोल पुत्र रामसुमेर के रूप में की थी। मारा गया युवक राबर्ट्सगंज कोतवाली थाना क्षेत्र के पाड़र गॅंाव का निवासी था। इसकी शिनाख्त के बाद जनसंगठनों ने मुठभेड़ की कहानी पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया था। लेकिन उस समय कोई कार्यवाही नहीं हुई थी। मजिस्ट्रेट द्वारा साक्ष्य प्रस्तुत करने की अंतिम तिथि 7फरवरी को मारे गये नन्दलाल की पत्नी सुभागीदेवी भतीजा श्याम व बलवंत भाई राजेश एवं सुदामा ने हलफनामा प्रस्तुत किया है। सूत्रों का कहना है कि हलफनामें में इन लेागों ने नन्दलाल को एक मेहनतकश मजदूर बताया है। लोगों का कहना है कि वह मेहनत करके अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। काम की तलाश में वह अक्सर बाहर आया जाया करता था। स्वाभिमानी किस्म का होने की वजह से गांव के कुछ सामतों की आंखों में खटकता था। लोगों ने पुलिस से मुखबीरी करके उसे नक्सली गतिविधियोें में लिफ्त दिखाकर मुठभेड़ में हत्या करा दी। इस मामले राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच मानवाधिकार कानूनी सलाह केन्द्र व अधिवक्ता विकास शाक्य ने आवाज उठायी थी। इसी के साथ एक अन्य मामले की भी जाॅंच कराने की मांग जोर पकड़ने लगी है। करमा थाना क्षेत्र के सुरेश व महेन्द्र 11 मई 2007 से अपने गाॅंव से लापता है। इन दोनों को भी पुलिस द्वारा मारे जाने की बात कहीं जा रही है। इस बात की पुष्टि दो अन्य लड़के रामसिंह व राजकुमार द्वारा की जा रही है। इन दोनों लड़कों का कहना है कि हम सभी 11 मई 2007 को अपने गाॅंव से सूरत काम की तलाश में जा रहे थे। राबर्ट्सगंज जाते समय पुलिस ने हम सभी को पकड़ लिया। अगले दिन हम दो लोगों को छोड़ दिया गया। महेन्द्र व सुरेश को पुलिस अपने पास रख लीं। सुरेश के पिता बिजय शंकर ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष से शिकायत की थी। आयोग ने इस पर भी एक जाॅंच सुनिश्चित कर दी है। सोनभद्र पुलिस जाॅंचों के बारे में कुछ भी कहने से कतरा रही है। रनटोला मुठभेड़ का हश्र सामने होने से पुलिस इन जाॅंचों से सक्ते में है।
विजय विनीत
8/फरवरी। रनटोला मुठभेड़ के फर्जी साबित होने के बाद एक और मुठभेड़ की मजिस्ट्रेटी जाॅंच गुरूवार को समाप्त हुई। इसे लेकर एक बार फिर पुलिस महकमा सकते में हैै। जिस युवक को नक्सली दिखाकर पुलिस ने नौ साल पहले मार गिराया था उसके परिजन हलफनामा दाखिल कर मजिस्ट्रेट के समक्ष सारी हकीकत प्र्रस्तुत कर दिये हंै। जनपद में कार्यरत तमाम मानवाधिकार संगठनों को एक बार फिर दूध का दूध और पानी का पानी होने की उम्मीद जगी है। एक माह पूर्व सोनभद्र की फास्ट ट्रैक कोर्ट नें रनटोला मुठभेड़ में चैदह पुलिस कर्मियों को उम्र कैद की सजा सुनायी। इसके बाद कई जन संगठनोें ने जनपद में हुई तमाम मुठभेड़ों पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया। इसे गंभीरता से लेते हुए उप जिलाधिकारी सदर को जिला मजिस्ट्रेट ने 26 जुलाई 2001 को हुई एक मुठभेड़ की मजिस्ट्रेटी जाॅंच करने का जिम्मा सौंप दिया। उप जिलाधिकारी सदर ने इसमें 7 फरवरी 2010 तक किसी भी तरह का साक्ष्य प्रस्तुत करने का समय नियत कर दिया। पुलिस ने 26 जुलाई 2001 को पन्नूगंज थाना क्षेत्र के ढोसरा गाॅव के जंगल में एक युवक को मार गिराया था। पुलिस का कहना था कि मारा गया युवक नक्सली था। लगभग तीन साल बाद 3 अक्टूबर 2004 को मारे गये युवक की पहचान पुलिस ने नन्दलाल कोल पुत्र रामसुमेर के रूप में की थी। मारा गया युवक राबर्ट्सगंज कोतवाली थाना क्षेत्र के पाड़र गॅंाव का निवासी था। इसकी शिनाख्त के बाद जनसंगठनों ने मुठभेड़ की कहानी पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया था। लेकिन उस समय कोई कार्यवाही नहीं हुई थी। मजिस्ट्रेट द्वारा साक्ष्य प्रस्तुत करने की अंतिम तिथि 7फरवरी को मारे गये नन्दलाल की पत्नी सुभागीदेवी भतीजा श्याम व बलवंत भाई राजेश एवं सुदामा ने हलफनामा प्रस्तुत किया है। सूत्रों का कहना है कि हलफनामें में इन लेागों ने नन्दलाल को एक मेहनतकश मजदूर बताया है। लोगों का कहना है कि वह मेहनत करके अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। काम की तलाश में वह अक्सर बाहर आया जाया करता था। स्वाभिमानी किस्म का होने की वजह से गांव के कुछ सामतों की आंखों में खटकता था। लोगों ने पुलिस से मुखबीरी करके उसे नक्सली गतिविधियोें में लिफ्त दिखाकर मुठभेड़ में हत्या करा दी। इस मामले राष्ट्रीय वन जन श्रमजीवी मंच मानवाधिकार कानूनी सलाह केन्द्र व अधिवक्ता विकास शाक्य ने आवाज उठायी थी। इसी के साथ एक अन्य मामले की भी जाॅंच कराने की मांग जोर पकड़ने लगी है। करमा थाना क्षेत्र के सुरेश व महेन्द्र 11 मई 2007 से अपने गाॅंव से लापता है। इन दोनों को भी पुलिस द्वारा मारे जाने की बात कहीं जा रही है। इस बात की पुष्टि दो अन्य लड़के रामसिंह व राजकुमार द्वारा की जा रही है। इन दोनों लड़कों का कहना है कि हम सभी 11 मई 2007 को अपने गाॅंव से सूरत काम की तलाश में जा रहे थे। राबर्ट्सगंज जाते समय पुलिस ने हम सभी को पकड़ लिया। अगले दिन हम दो लोगों को छोड़ दिया गया। महेन्द्र व सुरेश को पुलिस अपने पास रख लीं। सुरेश के पिता बिजय शंकर ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष से शिकायत की थी। आयोग ने इस पर भी एक जाॅंच सुनिश्चित कर दी है। सोनभद्र पुलिस जाॅंचों के बारे में कुछ भी कहने से कतरा रही है। रनटोला मुठभेड़ का हश्र सामने होने से पुलिस इन जाॅंचों से सक्ते में है।
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