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हत्यारे निकले पत्रकार

जनादेश डाट इन/विजय ༯div> सोनभद्र। अभी सीबीआई जांच में सोनभद्र के कुछ पत्रकारों पर कोयले चोरी में संलिप्तता की कालिख साफ नहीं हो पायी थी कि फर्जी रनटोला कांड में पत्रकारों की भूमिका ने मीडिया के दामन को भी रक्तरंजित कर दिया है। देश भर से निर्दोषों के कत्ल पर पत्रकारों की भूमिका पर सवाल खड़े होने लगे हैं।इण्डियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष के विक्रमराव ने सम्पूर्ण प्रकरण को घृणित बताते हुए दोषी व्यक्तियों की जांच की मांग की है, वहीं पीयूएचआर के सदस्य विजय विनीत ने भारत सरकार के गृह मंत्री व प्रदेश के मुख्यमंत्री को भेजकर आवश्यक कार्यवाही की मांग की है। मानवाधिकार संगठनों द्वारा इस प्रकरण पर जनहित की तैयारी से मीडियाकर्मियों में खलबली मच गयी है।वर्ष 2003 में सोनभद्र के रनटोला के जंगलों में इनकाउन्टर के लिए ले जाये गये दो निर्दोष युवकों को गोली मारने से पहले तत्कालीन पुलिस अधीक्षक के सत्यनारायणा ने स्थानीय पत्रकारों को बुलवाया और इस खूनी खेल के नैतिक समर्थन में पत्रकारों से सहमति मांगी। काजू की बर्फी और काजू की नमकीन खाकर पत्रकारों ने सहमति तो दी ही, इस खेल को सच्चाई का जामा पहनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। वे लगातार इस इनकाउन्टर के समर्थन में खबरे लिखते रहे। पत्रकारों से हरी झण्डी मिलते ही अन्य मुठभेड़ों की तरह पुलिस के वायरलेस चीखने लगे। ‘‘जंगल में भागते बदमाशों ने पुलिस फोर्स पर हमला बोल दिया है, दोनों ओर से फायरिंग जारी है।’’ कुछ ही देर में दो निर्दोष युवकों की तड़पती देह लाश में तब्दील हो गयी। मृतक प्रभात के पिता लल्लन श्रीवास्तव की आंखें सात वर्षों बाद भी डबडबा आती हैं।वे रूंधे गले से कहते हैं ‘साहब, पत्रकार जी लोग चाहे होते तो उनका बेटा न मारा जाता।’ मुठभेड़ में शामिल सभी चैदह पुलिसकर्मियों को आजीवन कारावास की सजा होने के बाद तत्कालीन एसपी और मीडियाकर्मियों को सजा दिलाने की मांग जोर पकड़ने लगी है।देश के पूर्व राष्ट्रपति डा0 एपीजे अब्दुल कलाम ने मीडिया के बारे में अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा था ‘अपने रचनात्मक स्वरूप में मीडिया ब्रम्हा के सामान है, उसे राष्ट्रीय विकास का इंजन बनना चाहिए।’ लेकिन समाज को दिशा देने को कौन कहे मीडिया की दुरभिसंधियां कितना विध्वंस रूप पैदा कर सकती हैं, रनटोला कांड इसका ज्वलंत उदाहरण है। इण्डियन फेडरेशन आॅफ वर्किंग जर्नलिस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष के.विक्रम राव ने कहा कि रनटोला कांड में मीडियाकर्मियों की कथित भूमिका घृणित है। इसकी जांच अवश्य होनी चाहिए।उ0प्र0 श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष हसीब सिद्धकी ने कहा कि निर्दोषों के कत्ल में मीडिया के भूमिका पर उठे सवाल ने लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ को शर्मशार किया है। आईएफडब्लूजे के राष्ट्रीय पार्षद सिद्धार्थ कलहंस ने मीडिया को व्यवस्था के साथ मिलकर गन्दे खेल न खेलने की नसीहत देते हुए इस प्रकरण के जांच की मांग की है। भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा0 भगवान प्रसाद उपाध्याय ने कहा कि ‘मीडिया समाज को सूचना देने के लिए जवाबदेह है न कि पुलिस का मुखबीर बनने के लिए।’ उन्होंने ने आगे कहा कि निर्दोषों की हत्या में सहभागिता सिर्फ मीडिया पर नहीं बल्कि मानवता पर लगा ऐसा धब्बा है, जिसके दाग को आसानी से नहीं धोया जा

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