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बौद्धिक दिवालियापन

विजय विनीत
जिस देश के लेखक , पत्रकार , साहित्कार व आम जन से सरोकार रखने वाले लोगो का विचार देश काल समय के अनुसार न होकर विषयवस्तु से भटक जाय उस देश की क्या स्थिति होगी बताने की जरुरत नही । जाहिर है ऐसी स्थिति में देश दिग्भ्रमित हो जाएगा । ऐसा ही कुछ दस अक्तूबर को सोनभद्र नगर में पत्रकार नरेन्द्र मोहन की ७५वी जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में देखने को मिला । ब्लाक सभागार में नक्सलवाद व आतंकवाद के परिप्रेक्ष में पत्रकारिता के दायित्व विषय पर संगोष्ठी का आयोजन था। यह विषय जिसने भी रखा वह साधुवाद का पात्र है । क्योकि जब इस विषय पर संगोष्ठी हो रही थी उसके ठीक ३६ घंटे पूर्व नक्सलियों ने गढ़चिरो़ली में १७ पुलिस कर्मियों को गोलियों से भून डाला था और ७२ घंटे पूर्व झारखण्ड में नक्सलियों ने तालिबानी आतंकवादियों की बर्बता का अनुकरण करते हुए खुफिया शाखा के एक पुलिस इंस्पेक्टर का सर कलम कर दिया था । इसके अलावा नक्सलवाद पर प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह व गृह मंत्री चिदम्बरम भी गंभीर चिंता प्रगट कर रहें थे । गंभीर विषय के साथ ही गंभीरता के साथ संगोष्ठी में तमाम पत्रकार शिक्षक अधिवक्ता, समाजसेवी व सामाजिक सरोकारों से अपना वास्ता रखने वाले लोग उपस्थित थे ।
इस संगोष्ठी में मुख्य वक्ता पुलिश अधीक्षक डा प्रितिंदर सिंह व जिलाधिकारी पंधारी यादव थे । विषय के अनुरूप इन दो अधिकारियों क आलावा साहित्यकार अजय शेखर , पत्रकार विजय शंकर चतुर्वेदी सामजिक कार्यकर्ता महेशा नन्द ही अपना विचार व्यक्त कर पाये । वहां मौजूद लोग तो उस समय हैरान रह गए जब विद्वान डा अर्जुनदास केशरी विषय से पुरी तरह हट गए । उनहोंने तो यहाँ तक कहा की गांधी जी ने जिस चरखे से देश को जगाया वह यही से गया था । इसके अलावा अपने विचार में उनहोंने कठपुतली लोककला तक का सम्बन्ध नक्सलवाद से जोड़ दिया । इसके अलावा कुछ अन्य वक्ताओं ने भी विषयवस्तु को छोड़कर दूसरी लिक पकड ली। विद्वान नरेन्द्र मोहन की जयंती पर अपने को स्वनाम धन्य मानने वाले लोगो का विषय से भटकना वहा मौजूद हर प्रबुद्ध जन को खटका । लेकिन कहे कौन वह भी खुलकर, फ़िर भी बौद्दिक लोगो का मूल्यांकन सभी लोगो ने कर लिया था । यह अगर बौद्दिक दिवालियापन नही तो और क्या कहा जाएगा । जिस जिले की १३ वर्षीय युग रत्ना जिसने अभी १५ दिनों पूर्व संयुक्त राष्ट्र में १०० देशो के राष्ट्राध्यक्षों के समक्ष जिस आत्म विस्वास से संबोधन किया वह पुरी दुनिया ने सराहा । रत्न्ना ने जब अपनी बात विषय के अनुसार शुरू की तो लोगो ने उसे अंत तक इतनी तन्मयता से सूना की सम्मलेन स्थल पर उसकी आवाज के शिवाय कुछ सुनाई नही दे रहा था। क्या उसे किसी ने सिखा पढा कर भेजा था, नही क्योकि उसने पुरी बेवाकी से अपनी बात रखी थी और विषय से वह नही भटकी थी । जिस जिले की १३ वर्षीय बालिका दुनिया में अपने विचारों से धुम










मचा दी हो उस जिले का बौद्दिक तबका विषय से हट जाय यह चिंता का विषय है ।

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