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जुलाई, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

राजशाही से भी खतरनाक साबित होगी यह लोकशाही

आजादी के बाद भी सत्ता की चाभी कुछ गिने चुने लोगो के हाथों संसद व विधान सभाओं में बढ़ रही वंशवाद की वेळ आजादी के लिए मर मिटनें वालों ने सपने तो बहुत देखें होगें लेकिन उनमे दो महत्व पूर्ण थे । एक था अंग्रेजों को भगाकर स्वतंत्रता हासिल करना और दूसरा भारत से राज सत्ता का खात्मा व लोकतान्त्रिक व्यवस्था के तहत देश में सत्ता का सञ्चालन । अकल्पनीय कष्टों व तमाम कुछ खोने के बाद देश आजाद तो हुआ लेकिन पूर्ण रूप से लोकतान्त्रिक व्यवस्था देश में लागू नही हो सकी है । भारत में आजादी के पूर्व ५६५ छोटी बड़ी रियासतें थीं । इनमे कुछ काफी बड़े राज घराने थे जो सदियों से कायम थे तो कुछ ऐसी भी रियासतें थी जिन्हें दिल्ली पर शासन करने वाले शासको ( अंग्रेज व मुग़ल शासकों ) ने बना दिया था । आजादी के बाद सभी रियासतों का विलय लोकतान्त्रिक व्यवस्था के तहत भारतीय गणराज्यों में हो गया । कुछ ने अगर भारतीय गणराज्य में शामिल होने से इनकार किया तो सरदार बल्लभ भाई पटेल ने उन्हें मजबूर किया और सभी रियासतें टूट गयीं । 26 जनवरी १९५२ से भारतीय संविधान के तहत देश का सञ्चालन शुरू हुआ । पहला लोक सभा चुनाव सन १९५२ में हुआ तो तमाम ...

महाराज वसूल रहे प्याज

विजय विनीत सोनभद्र तिलस्मी है विजयगढ़ की चन्द्रकान्ता की प्रेम कहानी तिलस्म से भरी है । विजयगढ़ दुर्ग २१ सदी के वर्तमान में भी अभी तिलस्मी बना हुआ है । भयंकर गर्मी में जब सरे तालाब , नदियाँ , नाले सुख जाते हैं तब भी १८०० फिट की उचाई पर स्थित रामसरोवर में पानी भरा रहता है। यह किसका प्रताप है । शायद यह उस पुण्यात्मा राजा महाराजा की अच्छी करनी का प्रतिफल हो जिसे हम आज तक नही समझ पायें हो । यह न सूखने वाला पानी हमें अजर , अमर , अविनाशी आत्मा का बोध करा रहा हो की पुण्य कर्म करो जिसे लोग सदियों तक भूला न पायें । विजयगढ़ के अलावा यहाँ बड़हर व अगोरी नाम की दो और रियासते थी । आजादी के बाद रियासते तो समाप्त हो गई लेकिन कुछ राजाओं के सर से इस लोकतंत्र में भी महाराजा का भुत नहीं उतरा है । वह आज भी अपने को महाराज कहलाने में ही अपनी शान समझते हैं । वह अपने महल के इर्द -गिर्द गरीबो से टेक्स वसूली करना अपना अधिकार समझते है । ऐसे ही एक महराज ...